अच्छे कर्म ...

अच्छे कर्म

 एक गांव में रहने वाले गरीब धनीराम सेठ से शुरू होती है। जी हां, गरीब धनीराम सेठ, आप सोच रहे होंगे सेठ और वह भी गरीब, यह दोनों विरोधाभासी शब्द एक साथ कैसे?


यह सब भाग्य का खेल है दोस्तों। हर इंसान के जीवन में कभी उधर तो कभी चढ़ाव आते हैं। उसी तरह धनीराम सेठ जी किसी जमाने में बहुत अमीर हुआ करते थे और उन्होंने खूब दान धर्म और पुण्य भी किया था, लेकिन समय पलटा और वह धीरे-धीरे अपना धन खोता गया। अंत में, वह इस हालत में पहुंच गया कि लोग उसे गरीब धनीराम सेठ के नाम से जानने लगे।


लेकिन कहते हैं ना कि अच्छे कर्मों का फल देर-सवेर ही सही, मिलता जरूर है। ऐसा ही कुछ इस गरीब धनीराम सेठ के साथ भी होने वाला था।


जिस गांव में यह सेठ रहता था, वहां एक बार राजा के लोगों ने ऐलान किया कि जिन्होंने भी अच्छे काम किए हैं, वे अपने अच्छे काम गिनवा कर राजा से इनाम ले सकते हैं।


इस ऐलान को सेठ की पत्नी ने सुन लिया। सेठ की पत्नी बहुत खुश हो गई क्योंकि वह जानती थी कि अपने अच्छे दिनों में सेठ ने अनगिनत पुण्य के काम किए।


पत्नी ने सेठ को यह बात बताई, तो सेठ भी खुश हो गया और बोला, "अगर ऐसा है तो फिर हमें बहुत बड़ा इनाम मिलना चाहिए क्योंकि हमारे अच्छे कामों की सूची बहुत बड़ी है।"


अगले दिन सेठ सुबह-सुबह चार रोटियां बांधकर राजा के महल की ओर चल पड़ा। सेठ के घर से राजा का महल काफी दूर था और सफर लंबा था। आधे रास्ते में पहुंचने के बाद सेठ काफी थक गया। सेठ एक पेड़ की छांव के नीचे बैठकर आराम करने लगा और अपने साथ लाई रोटियों को खाने की सोचने लगा।


सेठ खाने की सोच ही रहा था कि तभी वहां एक गाय और उसके दो बछड़े आए। सेठ के हाथों में रोटियां देखकर गाय और उसके बछड़े उसके सामने आकर खड़े हो गए और उनके हाव-भाव से सेठ ने समझ लिया कि वे भूखे हैं और सेठ से खाना मांग रहे हैं। अपने अच्छे दिनों में सेठ के पास काफी गायें थीं, इसलिए गायों का व्यवहार सेठ अच्छे से जानता था।


सेठ की परिस्थिति भले ही अभी अच्छी नहीं थी, लेकिन सेठ का स्वभाव बिल्कुल भी नहीं बदला था। वह पहले से ही परोपकारी था, इसलिए उसे गाय पर दया आ गई और उसने अपने साथ लाई रोटियों में से दो रोटियां गाय को दे दीं।


कुछ ही क्षण में दो रोटियां खाने के बाद गाय फिर से सेठ की तरफ देखने लगी तो सेठ के मन में विचार आया कि यह गाय ज्यादा भूखी लगती है। बिचारी को दो बच्चों को दूध भी पिलाना होता है। इन दो रोटियों से उसका क्या होगा?


सेठ ने बाकी की दो रोटियां भी गाय को दे दीं। पास वाले तालाब से सिर्फ पानी पीकर सेठ अपने सफर में आगे बढ़ गया।


राजा के दरबार में जब सेठ पहुंचा तो राजा ने पूरे दरबार के सामने सेठ से उसका नाम पूछा और अपने अच्छे कर्मों के बारे में बताने के लिए कहा।


सेठ ने राजा को प्रणाम किया और अपने कामों के बारे में बताना शुरू किया। सेठ ने कहा, "महाराज, मैंने कई भूखों को खाना खिलाया है। कई मंदिरों में दान दिया है। कई निराश्रित लोगों को आश्रय दिया है। कई तीर्थ स्थानों की यात्रा की है। सैकड़ों साधु संतों की सेवा की है।"


ऐसे दर्जनों काम बताने के बाद सेठ बोला, "महाराज, ये हैं मेरे कई सारे अच्छे कर्मों में से कुछ अच्छे कर्म। इनके बदले आप जो भी इनाम देना चाहें, दे दीजिए।"


थोड़ी देर सोचने के बाद राजा ने कहा, "अगर तुम्हारे कुछ और अच्छे कर्म हैं, तो वह बताओ! क्योंकि अब तक तुमने जो मुझे बताए हैं, उन्हें मैं अच्छे कर्म की श्रेणी में नहीं गिनता।"


सेठ को राजा की बात सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। सेठ ने राजा को हाथ जोड़कर कहा, "अगर आपको मेरे बताए ये कर्म अच्छे कर्म नहीं लगते या पुण्य कर्म नहीं लगते तो मेरा बाकी के कर्मों का उल्लेख करना फिजूल होगा! आप मुझे इजाजत दीजिए, मैं वापस जाता हूं।"


सेठ दरबार छोड़कर जाने लगा, तब राजा के दरबारियों में से एक ने राजा के पास जाकर कुछ कहा, जिसे सुनने के बाद राजा ने सेठ को वापस दरबार में बुलाया।


राजा ने कहा, "तुमने अपने आज किए अच्छे काम के बारे में तो बताया ही नहीं!"


सेठ ने कहा, "महाराज, आज मैंने कोई अच्छा काम किया ही नहीं, फिर मैं आपको कैसे बताऊं!"


राजा ने उसी दरबारी को खड़ा होकर सारी घटना बताने के लिए कहा जिसने राजा को उसके बारे में बताया था।


दरबारी खड़ा हुआ और बोला, "महाराज, जैसे कि मैंने आपको बताया, मैं उसी गांव में रहता हूँ जहां पर यह सेठ आराम करने बैठा था और मैंने वहां देखा कि कैसे इन्होंने अपना सारा खाना पास आई गाय को खिला दिया और खुद बिना खाए सिर्फ पानी पीकर भूखे रहे।"


सेठ को पता चला कि राजा किस बारे में बात कर रहा था तो सेठ ने राजा से कहा, "किसी जानवर को खाना खिलाना कौन सा पुण्य का काम है? और इस बात को तो मैंने कब का भुला दिया था।"


राजा ने सेठ से कहा, "मेरे महान गुरु जी के बताए अनुसार मैं भी उन्हीं कामों को पुण्य कर्म मानता हूँ जिन्हें करते समय सच में निस्वार्थ भाव से किया जाए। उसी के लिए किया जाए जिसको उसकी जरूरत हो और सबसे बड़ी बात उस काम को करने के बाद भुला दिया जाए। यही कारण है कि आज तुमने जो काम किया वह तुम्हारे किए गए आज तक के सभी कामों में सबसे उत्तम और सर्वश्रेष्ठ था। जिसके लिए तुम सच में इनाम के हकदार हो।"


राजा ने सेठ को बहुत बड़ा इनाम दिया जिसे पाकर सेठ की आर्थिक परिस्थिति फिर से पहले जैसी हो गई और सेठ और सेठानी ने अब अपना पूरा जीवन निस्वार्थ भाव से अच्छे कर्म करने में लगा दिया।


कहते हैं कि दान धर्म और अच्छे कर्म एक हाथ से करो तो दूसरे हाथ को पता नहीं चलना चाहिए, लेकिन आजकल कुछ विपरीत ही होता है। आजकल लोग सिर्फ दिखावे के लिए दूसरों की मदद करते हैं।


अस्पतालों में दान करते हैं तो दीवारों पर अपना नाम लिखवाते हैं। गरीबों को खाना देते हैं तो उनके साथ सेल्फी खिंचवाते हैं। अब आप ही बताइए, क्या ऐसे कामों को अच्छे काम कह सकते हैं?

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