वक्फ बिल पर हुई बहस से राहुल गांधी के लिए ये हैं 3 बड़े सबक :-
राहुल गांधी को वक्फ बिल पर ट्रोल होने की नौबत तो नहीं ही आने देनी चाहिये थी - और सोशल मीडिया पर कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी की जगह राहुल गांधी के भाषण वीडियो वायरल होना चाहिये था.
राहुल गांधी न सही, लोकसभा में तो प्रियंका गांधी वाड्रा भी पहुंच चुकी हैं, और सोनिया गांधी भी राज्यसभा में ही हैं - लेकिन गांधी परिवार के तीन तीन सदस्य होने के बावजूद वक्फ बिल के खिलाफ एक की भी अलग से कोई चर्चा न हो, तो क्या समझा जाये?
वक्फ बिल पर संसद में 23 घंटे चर्चा हुई, लेकिन गांधी परिवार ने मोर्चा नेताओं के हवाले छोड़ दिया था.
राहुल गांधी का आधी रात के ड्रेस के लिए ट्रोल होना भी कोई बड़ी बात नहीं है, ये तो उनके विरोधियों के लिए हर रोज का रूटीन बन चुका है - लेकिन खास मौकों के खास दस्तूर भी होते हैं. मौके पर दस्तूर तो निभाये ही जाने चाहिये.
1. ममता से सबक लें, और वैसे ही स्टैंड लें
वक्फ बिल पर जैसे गौरव गोगोई और इमरान प्रतापगढ़ी ने संसद में मोर्चा संभाला है, धारा 370 पर बहस के दौरान तब कांग्रेस में रहे गुलाम नबी आजाद लीड रोल में दिखाई दे रहे थे - लेकिन राहुल गांधी का वैसा व्यवहार नहीं दिखा था, जैसा वक्फ बिल पर नजर आया है.
राहुल गांधी जम्मू कश्मीर के मामले में साथी नेताओं के साथ पूरे मन से लगे रहे. यहां तक कि कांग्रेस नेताओं के प्रतिनिधिमंडल के साथ जम्मू कश्मीर जाने की कोशिश भी की थी, लेकिन रास्ते से ही बैरंग लौटा दिये गये थे - वक्फ बिल को लेकर तो राहुल गांधी की तरफ से वैसा कुछ तो बिल्कुल भी नहीं देखने को मिला है.
ये ठीक है कि राहुल गांधी तो रामलला का दर्शन करने अयोध्या गये, न ही महाकुंभ के दौरान संगम में डुबकी ही लगाई - लेकिन बात तो ये भी है कि ममता बनर्जी जैसा सख्त रवैया भी तो नहीं दिखाया है.
राम मंदिर उद्घाटन समारोह के बहिष्कार के लिए सबसे पहले ममता बनर्जी ने आवाज उठाई, और कांग्रेस ने उसे फॉलो किया. जब कुछ कांग्रेस नेताओं ने अयोध्या जाने की बात की तो नरम पड़े, और कदम पीछे भी खींच लिये थे.
अब तो कांग्रेस की भलाई इसी में है कि राहुल गांधी ममता बनर्जी से सबक लें, और अगर वास्तव में मुस्लिम वोट चाहिये तो ममता बनर्जी से सीखें - किसी कौम का भरोसा बनाये रखने के लिए क्या क्या करना और सहना पड़ता है.
अगर ममता बनर्जी से किसी तरह की चिढ़ हो, तो राहुल गांधी अपने ही प्रिय सांसद इमरान प्रतापगढ़ी को फॉलो करें - अब भी बहुत कुछ नहीं बिगड़ा है.
जो काम राहुल गांधी, प्रियंका गांधी या सोनिया गांधी की तरफ से होना था, वो इमरान प्रतापगढ़ी ने कर दिखाया है - गांधी परिवार भले ही इमरान प्रतापगढ़ी की तरह भाषण नहीं दे पाता हो, लेकिन किसी और का लिखा भाषण पढ़ा तो जा ही सकता है.
अगर कारोबारी गौतम अडानी पर राहुल गांधी के भाषण के बाद देश में तूफान मच सकता है, तो वक्फ बिल पर क्यों नहीं? कांग्रेस नेतृत्व को इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचना चाहिये.
2. अब सॉफ्ट हिंदुत्व को तो भूल ही जाएं
एक दौर था जब राहुल गांधी की छवि शिवभक्त जनेऊधारी हिंदू नेता के रूप में गढ़ने की शिद्दत से कोशिश की गई थी, लेकिन वो सब एकदम नहीं चला. शायद इसलिए भी क्योंकि जब तक लोग राहुल गांधी के नये कलेवर को गंभीरता से लेने के बारे में सोचते, वो तौबा कर चुके थे.
चुनाव के दौरान मौसमी आस्था का चोला ओढ़ लेने भर से वोट नहीं मिलते - वोट पाने के लिए पूरे साल एक ही लाइन पर टिके रहना पड़ता है, और अपने किसी भी ऐक्ट से अवाम का भरोसा नहीं टूटने देना होता.
अब तो यही ठीक रहेगा कि राहुल गांधी सॉफ्ट हिंदुत्व के प्रयोग भूल ही जायें, हकीकत तो कबूल करें, और सेक्युलरिज्म की राजनीति पर टिके रहने का भरपूर प्रयास करें.
3. तुष्टिकरण के आरोपों की परवाह न करें, खुल कर खेलें
कांग्रेस नेतृत्व को ये डर रहा है कि बीजेपी ने उसे मुस्लिम पार्टी के रूप में प्रचारित कर दिया है, लेकिन मौजूदा रवैया तो न घर का रहने देने वाला है, न घाट का - वक्फ बिल पर कांग्रेस नेतृत्व के रवैये को लेकर मुस्लिम नेताओं की बातों से तो ऐसा ही लगता है.
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली कहते हैं, हमें प्रियंका गांधी में इंदिरा गांधी दिखती हैं… कांग्रेस का मुसलमानों को सपोर्ट करने, और उनके लिए बोलने का इतिहास रहा है… कांग्रेस ने विधेयक के खिलाफ मतदान जरूर किया, लेकिन मैं लोकसभा में राहुल गांधी को बोलते हुए सुनना चाहता था.
मुस्लिम नेताओं का कांग्रेस से नीतीश कुमार की पार्टी जैसा मोहभंग तो नहीं हुआ है, लेकिन पहले जैसा यकीन कायम हो, ऐसा भी नहीं लगता. कांग्रेस की उनकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी है.
न्यूज एजेंसी से बातचीत में मौलाना महली कह रहे हैं, मुझे आश्चर्य हुआ कि लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष ने सदन में इसको लेकर कोई बयान नहीं दिया.
अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव भी तो उसी ढर्रे की मुस्लिम राजनीति करते हैं, लेकिन क्या उनको हिंदुओं के वोट नहीं मिलते?
अगर अखिलेश और तेजस्वी को यादवों के वोट मिलते हैं, तो राहुल गांधी को सभी पिछड़ों के वोट भी मिल सकते हैं - लेकिन उसके लिए जातिगत जनगणना पर भी टिके रहना होगा, और मुस्लिम हितों के मामले में एक मजबूत लाइन लेनी होगी. दो कदम आगे और तीन कदम पीछे चलने वाला कभी आगे नहीं बढ़ पाता.
'हुआ तो हुआ...' - ये भी कांग्रेस की ही लाइन है, जिसे सैम पित्रोदा के मुंह से सुनने को मिला था. राहुल गांधी एक बड़ा मौका चूके जरूर हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं कि सारे मौके गंवा दिये हों - लेकिन, आगे बढ़ने से पहले संभलने के लिए वक्फ बिल आखिरी नहीं तो एक बड़ा मौका तो था ही.

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
The main objective of our Website or blog jaishreekrishna1298.blogspot.com is to provide educative, entertaining and informative stories and information in Hindi language to the people . Through jaishreekrishna1298.blogspot.com we want to provide information through internet so that people can get more and more information about these stories and know more about them in India and the world. Through this website, we are trying to reach people with animal stories, grandmother's stories, Panchatantra, Akbar Birbal stories, Tenaliram stories, religious stories, stories of great men and entertainment stories. The purpose of these stories is not to hurt the feelings of people of any caste, religion, gender, community or country.If the characters or events in our stories are similar from another person or event then it can be a coincidence.
Information is updated from time to time in our website.