बिछड़े सभी बारी बारी

 

बिछड़े सभी बारी बारी

गुरुदत्त साहब की एक सुप्रसिद्ध मूवी "कागज के फूल" का एक बहुत प्रसिद्ध गाना है


देखी जमाने की यारी


बिछड़े सभी बारी बारी ।।


यह गाना अपने जमाने में सुपर हिट हुआ था । गाने को रफी साहब ने गाया भी बहुत शानदार तरीके से था ।


आज मुझे यह गाना क्यों याद आ रहा है ? पूछेंगे नहीं क्या ?


अरे भाई ! इस देश में एक न्यूज चैनल है जिसका नाम है "खाज तक" । कहने को तो यह एक न्यूज चैनल है लेकिन इस चैनल पर न्यूज के बजाय "व्यूज" दिखाए जाते हैं जिन्हें देख सुन कर पूरे बदन में "खाज" मचने लगी जाती है । इसीलिए लोगों ने इस चैनल का नाम "खाज तक" चैनल रख दिया था ।


इस नामकरण के पीछे इस चैनल के मालिकों का योगदान भी कुछ कम नहीं है । वे "राज माता" की चमचागिरी में इतने गिर गए कि उन्होंने अपने चैनल का नाम "इटली तक" करने का मन बना लिया था । लेकिन ऐसा करने से उन्हें "राजमाता" ने रोक दिया क्योंकि इससे उनकी पोल खुल जाने का खतरा था ।


इस न्यूज चैनल के नाम पर एक "खानदान" विशेष की प्रशस्ति गान का कार्यक्रम उसके अस्तित्व में आने से अब तक बदस्तूर चल रहा है और जनता के समक्ष झूठ पर सच का मुलम्मा चढ़ाकर "खाजदीप खरदेसाई" जैसे "खुर सेवक" उसे समाचार का नाम देते आए हैं । खाजदीप का तो इतिहास भरा पड़ा है झूठ की फैक्ट्री चलाने का । लेकिन जब "मालकिन" हो मेहरबान तो क्या करेगा "खरुण खुरी" श्रीमान ।


लोगों की याददाश्त थोड़ी कमजोर होती है इसलिए उन्हें याद दिलाने के लिए इतना बता दूं कि जब 26 जनवरी 2021 को कुछ देश विरोधी , आतंकवादी , खालिस्तानी , उपद्रवी दिल्ली की सड़कों पर किसान का वेश पहन कर ट्रैक्टरों से रेस लगा रहे थे और लाल किले पर तिरंगा झंडा हटाकर खालिस्तानी झंड़ा लहरा रहे थे । तब एक आस्ट्रेलिया से आया हुआ एक बहका सा नौजवान अपनी ही गलती से अपने ही ट्रैक्टर के नीचे आ गया था ।


तब इस प्रोपेगैंडा बाज खाजदीप जो कि खाज तक चैनल में एडीटर का काम करता है , को अपना खेल दिखाने का मौका मिल गया । वह एक पत्तलकार बनकर दिल्ली की सड़कों पर उतर गया और अपना तथाकथित किसानों के बीच से अपना एजेंडा चलाने लगा ।


क्या अब भी यह बताने की आवश्यकता है कि खाजदीप और खबीश कुमारों का एजेंडा क्या होता है ?


अपने ही ट्रैक्टर के नीचे दबने से मृत आस्ट्रेलियाई युवक को यह पत्तलकार सरासर झूठ बोलते हुए उसे पुलिस की गोली से मरा हुआ बताने लगा और अपनी "इटली वाली मालकिन" की चमचागिरी में भारत सरकार के विरुद्ध झूठ और प्रपंच फैलाने लगा ।


लेकिन कहते हैं ना कि झूठ के पैर नहीं होते हैं इसलिए वह ज्यादा आगे चल नहीं पाता है । यद्यपि इसने गुजरात दंगों को लेकर झूठ और प्रपंच का खेल कोई 10 वर्षों तक खेला था । लेकिन तब "मालकिन" सुपर प्राइम मिनिस्टर थीं इसलिए उन 10 सालों में ऐसे चमचों की लॉटरी खूब निकली ।


इन जैसे चमचों को अपने प्रोपेगैंडा के लिए पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे पुरुस्कार भारत सरकार ने जी भरकर लुटाए । किसी को राज्य सभा का माननीय सांसद बना दिया तो किसी को कुछ और । अब इन खाजदीपों के बारे में क्या ही कहा जाए जो अपनी बीवी को एक राजनीतिक दल की सांसद बनवा कर खुद को "निष्पक्ष" पत्तलकार कहते हैं ।


तो, खाजदीप की 26 जनवरी, 2021 की पत्तलकारिता का भांडा उस घटना के सीसीटीवी ने फोड़ दिया । लेकिन शर्म तो उनको आती है जो शर्मदार होते हैं । बेशर्मों को भी क्या कभी शर्म आती है ?


सवाल दोनों पर उठे । पत्तलकारिता पर और चैनल पर । लेकिन दोनों एक ही चमचागिरी की थाली में भोजन करते थे इसलिए उनका क्या बिगड़ता ?


हिन्दू हृदय सम्राट तो 2002 से ही इन बेशर्मों की करतूतें जानता था इसलिए वह इनकी "दलाल पत्तलकारिता" पर ध्यान ही नहीं देता था ।


लेकिन साहब शर्म फिर भी जिंदा बची हुई थी । इन्हें नहीं आई तो क्या , इनकी मालकिन को ही शर्म आ गई ।


उसने दोनों पालतुओं को अपनी "हवेली" पर बुलाया और उन्हें जोरदार डांट फटकार लगाई


"तुम लोग मेरा बंटाधार करवा के मानोगे ! अरे ! जनता में अभी यह मुगालता बना हुआ है कि तुम्हारा "खाज तक" चैनल एक न्यूज चैनल है । क्या तुम जनता का मुगालता तोड़ना चाहते हो" ?


बिल्ली के सामने जैसे चूहों की गति होती है वैसी ही गति इन दोनों चरण चुंबकों की हो गई । दोनों बिल्ली के सामने "कुलामुंडी" खाने लगे और गिड़गिड़ाने लगे । तब जाकर मालकिन को दया आई और वह बोली


"ऐसा करो ! जनता को बरगलाने के लिए इस चरण चुंबक को 15 दिन के लिए "ऑफ एयर" कर दो" ।


मालकिन का आदेश हो गया तो अब कुछ नहीं हो सकता था । हालांकि खाजदीप ने शोले स्टाइल में कालिया की तरह बहुत कहा


"मैंने आपका नमक खाया है मालकिन" !


"तो अब एयर खा" ।


मालकिन ने उन्हें धक्के मारकर बाहर फिंकवा दिया और अपनी हवेली के फाटक भड़ाक से बंद करा दिए ।


लेकिन कुत्ते की दुम कभी सीधी हुई है क्या ? खाजदीप प्रोपेगैंडा चलाने का कोई मौका नहीं चूकता है और चरण चुंबन में कोई कसर नहीं छोड़ता है ।


जब चैनल के दूसरे पत्तलकारों ने खाजदीप की पत्तलकारिता को देखा और उसकी चैनल में "धाक" देखी तो बाकी पत्तलकार भी "चरण चुंबन कार्यक्रम" में मशगूल हो गए ।


खित्रा सिंह ने हाथरस कांड पर कैसी नौटंकी की थी , सबको पता होगा ! और राहुल दंगल को तो मोटा भाई ने इसी चैनल पर कैसा धोया था , वह वीडियो तो रिकॉर्ड तोड़ चुका है ।


लेकिन साहब , अब सोशल मीडिया का जमाना है । जनता इन प्रोपेगैंडा बाजों को अच्छी तरह पहचानती है । तो "खाज तक" वालों को भी पहचान गई ।


ऐसे दरबारी चैनलों से जनता का मोह भंग होने लगा । अब इस चैनल को देखने वाले केवल "चमचे" ही रह गए । जनता तो कब की उस चैनल से भाग चुकी थी ।


खाज तक ने अपनी इमेज ठीक करने के लिए एक "तिहाड़ी पत्तलकार" को अपने चैनल में जगह दे दी और उससे कहा गया कि तू चाहे ब्लैक को व्हाइट कर या व्हाइट को ब्लैक ! मगर कहीं से भी हों , दर्शक लाकर दे ।


तिहाड़ी पत्तलकार की इमेज "गोदी मीडिया" की बनी हुई थी इसलिए खाज तक के मालिकों ने सोचा कि इससे अपना काम बन जाएगा । गोदी वाले लोग इधर आ जाएंगे। लेकिन वह तिहाड़ी भी एक दिन खाज तक से भाग निकला ।


अब तो "खाज तक" में चुल्ल मच गई । एक से एक नामी गिरामी एजेंडा बाज पत्तलकार इसे छोड़ छोड़ कर जाने लगे ।


एक दिन "ॐ" का जाप करने वाली एक ऐंकर की सरेआम बेइज्जती इनके मालिक "खानदानी दल" के एक प्रवक्ता ने की तो वह भी तड़प उठी ।


उसने भी "मालकिन" की खूब प्रशस्ति पढ़ी थी पहले लेकिन शायद अब वह प्रशस्ति गान करते करते थक गई थी । इसलिए सुना है कि वह भी इसे छोड़ने की तैयारी कर रही है ।


एक और पत्रकार जिसने अपनी थोड़ी सी साख बनाए रखी थी , जो "श्वेत" रंग की बताई जाती हैं , के भी चैनल छोड़ने की खबरें चलने लगीं हैं ।


तो अब करोड़ रुपए का प्रश्न यह है कि "खाज तक" में बचेगा कौन ?


जवाब सबको पता है । मालिक और खाजदीप ! बस !


इसलिए चैनल के मालिक और जन्म जात चरण चुंबक दोनों जाम छलका कर गाए जा रहे हैं


हमारी करतूतें भारी भारी


बिछड़े सभी बारी बारी ।।


श्री हरि


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