क्रांतिकारी महिला नंगेली का महान इतिहास ...
वीर साहसी नंगेली ने स्तन ढकने के अधिकार की किस तरह लड़ी यह लड़ाई ........
भारतीय इतिहास साक्षी है कि विभेदीय वर्ण व्यवस्था ने स्त्री समाज को केवल यातनाएं ही नहीं दी, अपितु उसे त्रासदी की पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया। भारत का इतिहास तथ्यों के रूप में चीख चीख कर इस बात की गवाही देता है कि बहुजन स्त्रियों ने धर्मशास्त्रों की आड़ में अंतहीन शोषणकारी, आत्मघाती, आत्मग्लानि के हालातों को झेला है।
वर्तमान में वस्त्रों पर बहस करने वाले लोग,सभ्यता,संस्कृति की दुहाई देने वाले व्यक्तियों की जमात भूल रही है कि कभी धर्मांधता एवम लिंग भेद के चलते स्त्रियों से इन्होंने आवश्यक वस्त्र तक छीन लिए थे, और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए बहुजन स्त्रियों के लिए निवस्त्रों होने के नियम लागू कर डाले थे। तिहरे शोषण का शिकार उन महिलाओं ने कैसे समाज के कुबुद्धि, कुदृष्टि पुरुषों की नश्तरीय,अश्लीलतापूर्ण दृष्टियों को सहा होगा? सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
इतिहास के पृष्ठों से न जानें कितनी बहुजन महापुरुषों की वैचारिकी, साहस, संघर्षों की अनगिनत शौर्य कथाओं को मिटाकर उन्हें अपने शौर्य की कथाओं के रुप में प्रस्तुत किया गया। या कहें कि जानबूझकर अलिखित छोड़ दिया गया।
परिणाम स्वरूप बहुत सी पीढ़ियां इन सत्यों से अनभिज्ञ रह गई। दूसरी ओर इतिहास में स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए इतिहास को जातीय जामा पहनाकर लिखा गया।ऐसी ही एक महान क्रांतिकारी थी महाननायिका नंगेली। स्त्रियों में सर्वश्रेष्ठ महानायिका को नंगेली को हम कैसे विस्मृति न करें,जिसने सदियों से खुले अंग प्रदर्शन की दुर्गंधित रिवायत को समाप्त किया। बलिदान की साक्षात रूप महानायिका नंगेली ने परंपरा के नाम पर स्त्रियों पर थोप दी गई मिथ्यावादी प्रथा को विखंडित किया।
स्वतंत्रतापूर्व सन 1719 से 1949 के प्रारंभिक दौर का समय स्त्रीकाल का तिमिरकाल ही था। दक्षिण भारत के त्रावणकोर (केरल से तमिलनाडु का कुछ भू भाग) में स्त्रियों के लिए बेहद घिनौनी, अश्लीलता की परिचायक परम्परा थी। जिसे स्त्रियों पर ऊंची जातियों के सम्मान का सूचक बना थोप दिया गया था। किंतु असलियत यह थी कि पुरुषप्रधान स्थापत्य में स्त्रियों को लिंग भेदीयदृष्टि के कारणवश हीनभावना से ग्रसित किया गया।
ये कहना भी गलत नहीं होगा कि ये परंपरा पुरुषों को शारीरिक रूप से उत्तेजित कर स्त्रियों से जिस्मानी ताल्लुक़ात का खुलमखुल्ला आमंत्रण थी। ऐसा इसलिए कह रही हूं क्योंकि सवर्ण स्त्रियां भी राजपरिवार, मंदिर के पुजारी के समक्ष अर्धंनग्नावस्था में जाती थी, लेकिन उन्हें बाज़ार जैसे सार्वजनिक स्थलों पर ऊपरी शरीर ढकने की अनुमति थी। उन पर कोई दंडनीय प्रावधान नहीं था। इसके दूसरे पहलू का यथार्थ और भी भयानक,कुरूप,क्रूर था।
वर्णव्यवस्था में अंतिम श्रेणी की स्त्रियों के साथ हैवानियत का व्यवहार किया जाता था। इन्हें स्त्रियों के लैंगिक ही नहीं बल्कि दलित स्त्री होने के दुष्परिणामों को भी भोगना पड़ा।
जातीय जड़ों में भरे ज़हर ने दलित स्त्रियों के लिए विषाक्त वातावरण तैयार कर दिया। दलित महिलाओं को सार्वजनिक स्थलों पर भी स्तनभाग ढकने की इजाज़त नहीं थीl
यदि किसी ने साहस जुटा कर मंदिरों के पुजारियों के सामने कोई झीना वस्त्र भी इस केंचुकी भाग पर लिपटा लिया तो पुजारी उसे अपने पास रखे लाठी पर बंधे चाकू से फाड़ दिया करता था। अब ऐसा तो मुमकिन है नहीं कि नुकीले चाकू छाती के उस हिस्से को रक्त रंजित न करते हो,लहूलुहान होकर वह दर्द से चीखी न हो। इतने भर से भी इनके कलेजे में ठंड नहीं पड़ती थी।
तत्पश्चात भी दंडनीय रुप में नग्न अवस्था में स्त्री को भीड़ इकट्ठी कर सरेआम पेड़ पर लटका दिया जाता था। इतना ही स्तन अनुपतानुसार टैक्स वसूली भी महिलाओं से की जाती थी ताकि ऋण कभी चुका ही नहीं पाएं और गुलामगिरी कायम रहे।
ये वो समय था जब निर्ममतापूर्ण यातनाएं चरम सीमा पर थी। इन कठोर दंडों, टैक्स के दो सबब थे, एक दलित जाति के लोगों को भयभीत करना ताकि वे दमनकारी शक्तियों के खिलाफ़ आवाज़ न उठाएं। दूसरा उद्देश्य गुलामी की ओर धकेल जातीय हीनताबोध कराना।
स्त्रीकाल के इस तमसयुग की नादर समुदाय की महान क्रांतिकारी नायिका ने इस सड़ांध मारती प्रथा को समाप्त करने का संकल्प लिया।
वीरांगना नंगेली ने अपने स्तन ढकने के अधिकार के स्वर को बुलंद किया। सोच कर ही दिमाग़ की नसें तन जाती हैं कि ये स्त्रियां कैसा महसूस करती होंगी पुरुषों की कुदृष्टि जब इनके शरीर को चीर कर जाती होगी?आत्मा झलनी होकर शर्म से धरती में गड़ जाती हाेगीं।
उस समय के मर्दाना वर्चस्ववादी समाज में बैगैरती की इंतिहा थी।समाज की शक्तिशाली, दंभी, दमनकारी शक्तियों के गठित नियमों को विखंडित करना बहुत दुर्लभ कार्य था, किंतु उस संघर्षशील, क्रान्ति ज्वाला ने अपने स्तन बलिदान कर अपने दृढ़ संकल्प को पूरा किया।
अपनी देह के ऊपरी भाग पर वस्त्र धारण कर समाज के मठाधीशों को चुनौती दी। उन्होंने जलते सुर्ख़ अंगारों में हाशिए को दबाकर गर्म किया तथा उससे अपने दोनों स्तनों को छाती से पृथक कर केले के पत्ते पर रख दिया। जब टैक्स वसूली हेतु टैक्स अधिकारी आए तो टैक्स रुप में उन्हें अपने दोनों लहुलुहान स्तन प्रस्तुत कर दिए। अत्यधिक रक्त प्रवाह से उनकी मृत्यु हो गई। इतिहास में ऐसे भी साक्ष्य हैं कि उनके पति ने उनकी जलती चिता में कूदकर अपनी जान दे दी थी। उनकी मृत्यु उपरांत नादर स्त्रियों ने इस अधिकार आंदोलन को तीव्रता प्रदान की।
26जुलाई 1859 में भारतीय स्त्रियों को वस्त्रधारण करने का अधिकार मिला। टैक्स से भी मुक्ति मिली।

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