यौन संबंध…
जबरदस्ती का। जब शरीर चीखता रहे, लेकिन आवाज़ दबी रह जाए। जब आत्मा बार-बार कहे "नहीं," लेकिन कोई सुनने वाला न हो।
मैं सीमा, और ये मेरी कहानी है। अर्जुन और मैं बचपन से दोस्त थे। मोहल्ले की गलियों से स्कूल की क्लास तक, हर जगह साथ। दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला।
जब उसने शादी की बात की, मैं बहुत खुश थी। सोचा था, सब मान जाएंगे। लेकिन जब मैंने अपने पापा और भाई से अर्जुन के बारे में बताया, तो जैसे घर में तूफान आ गया। "हमारी जात से बाहर शादी? हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दोगी?" पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर था। "ये नाम भी दोबारा मत लेना!" भाई ने साफ मना कर दिया।
मुझे डर था कि अगर मैं कुछ उल्टा-सीधा कर बैठी, तो घरवाले कोई बड़ा कदम उठा सकते हैं। इसलिए मैंने चुपचाप उनकी पसंद से शादी कर ली। सोचा था, वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा… लेकिन मैं गलत थी।
शादी के बाद पहली ही रात मुझे एहसास हो गया कि मैं फंस चुकी हूं। मेरा पति शराबी था। उसने मुझे मर्जी के बिना छुआ। मैं कांप उठी, विरोध किया, लेकिन उसकी मर्दानगी को मेरी ना सुनाई नहीं दी।
हर रात मैं उसके हाथों नोची जाती, हर सुबह घाव छुपाकर हंसने का नाटक करती। मुझे सबसे ज्यादा दर्द तब होता, जब मैं अपने पापा और भाई को देखती।
उन्होंने सोचा था कि मेरी शादी से उनकी इज्जत बच गई। उन्हें क्या पता कि उनकी इस इज्जत के लिए उनकी बेटी रोज मर रही है।
कुछ दिनों पहले अचानक अर्जुन से बात हुई। वो अब भी अकेला था। जब मैंने उसे अपनी हालत बताई, तो उसकी आवाज़ कांप गई। "सीमा, क्यों झेल रही हो ये सब? चलो कहीं दूर चले चलते हैं। हम फिर से जिंदगी शुरू कर सकते हैं।" उसकी बातें मेरे दिल को छू गईं। मेरी आत्मा जो बरसों से कैद थी, आज पहली बार अपनी आज़ादी मांग रही थी।
लेकिन फिर पापा और भाई का चेहरा सामने आ गया। "अगर मैं घर छोड़कर चली गई, तो उनकी इज्जत का क्या होगा?" यही सवाल मुझे रोक रहा था। मैं सोचने लगी— क्या वो इज्जत मेरी तकलीफ से बड़ी है? क्या एक बेटी का दर्द, एक औरत का अपमान, एक पत्नी का शोषण—सबकुछ इज्जत के आगे छोटा पड़ जाता है?
हर रात मेरा पति मुझे अपने नशे का शिकार बनाता, और मैं अपनी किस्मत को कोसते हुए तकिए में मुंह छुपाकर रोती। अर्जुन की बातों से मन में एक उम्मीद की किरण तो जगी, लेकिन डर भी था। "अगर मैं चली गई, तो लोग क्या कहेंगे?" "क्या मेरे पापा और भाई कभी मुझे माफ करेंगे?" "अगर मैं रही, तो क्या मैं कभी खुद को माफ कर पाऊंगी?" मैं अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी, जहां से दो रास्ते निकलते थे— एक रास्ता, जो मुझे अर्जुन की तरफ ले जाता, एक नई जिंदगी की तरफ, जहां प्यार और सम्मान था। दूसरा रास्ता, जो मुझे यहीं रखता, इस नरक में, जहां मैं हर दिन सिर्फ जीने का नाटक Ptsd।
अब सवाल ये था— क्या मुझे अपने परिवार की इज्जत के लिए रोज मरना चाहिए? या फिर अपनी जिंदगी के लिए एक नया कदम उठाना चाहिए? अगर आप मेरी जगह होते, तो क्या करते?
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