एक भड़ास से भरा पत्र शिक्षक के नाम...

 नमस्कार गुरूजी,

सादर प्रणाम!

आज बाड़मेर-चौहटन रोड़ पर उण्डखा के पास मेरे मित्र श्रवण गौड़ के चाय के केबिन पर दोस्तों के साथ बैठा गपशप लगा रहा था I इतने में पुरानी यादों को ताजा करते हुये किसी दोस्त ने पूछा कि गिरधर तेरे मन में कोई गुस्सा है या किसी के प्रति भड़ास है I उसके प्रत्युत्तर में मैंने जो कहा वो आपके साथ भी साझा करना हूँ...

हाँ तो बात 2006 की है मैं आठवीं क्लास में था, आठवीं कक्षा के विदाई समारोह का आयोजन होने वाला था I उस समय स्कूल में नियम था कि जब आठवीं की विदाई होती थी, तो आठवीं क्लास के बच्चों से ही 50-50 रुपये लेकर ग्रुप फोटो, नमकीन +मिठाई का एक पीस की प्लेट दी जाती थी और एक माला मंगवाई जाती थी (30 rs फोटो+ 10 rs प्लेट+10 rs माला = 50 रूपये)I

पैसे विदाई समारोह से दो दिन पहले मंगवाये गये थे ताकि मालाओं आदि का इंतजाम हो सके I मैनें घर पर पैसे मांगे, लेकिन जिस घर में खाने के भी लाले पड़े, उस घर में 50 रूपये बचत होने का सवाल ही नहीं था, सो पैसो की व्यवस्था नहीं हो पाई I

अब आता है विदाई समारोह वाला दिन, बाकि सभी विद्यार्थियों के पैसे जमा हो गये थे लेकिन मेरे नहीं हो पाये थे I सुबह 10 बजे जब स्कूल गया तो आपने पैसे लाने वापस भेजा कि 50 रूपये लेके आ, नहीं तो विदाई नही दी जाएगी I मुझे पता था कि घर पर पैसे नहीं है फिर भी अनमने मन से वापस गया, धांधुपुरा होदी के पास पिताश्री सामने आ रहे थे तो उनसे 50 रूपये मांगे , खैर दो- तीन गालियाँ खाकर वापस खाली हाथ स्कूल पहूंचा I

विदाई समारोह की तैयारी हो रही थी, पर आपके द्वारा मना करने पर जब ग्रुप फोटो लेने की बारी आई तो मैं साथ में खडा़ नहीं हो सका I

फोटो सेशन के बाद अंग्रेजी के अध्यापक नारायण जी जांगिड़ की नजर बाहर मूंह उतारे हुये बैठे मेरे पर पड़ती हैं, तो उन्होंने बोला "गिरधर बेटा! तू फोटो में साथ नहीं आया" तब मैंने कहा सर मेरे पास पैसे नहीं थे, तो मैने कहा फलाने वाले सरजी ने मना कर दियाI तब नारायण जी ने मुझे कहा कि ठीक है पैसे नहीं थे तो फोटो नहीं देते पर ग्रुप फोटो में तो साथ लेते, क्योंकि आठवीं तो तूमने भी पास की हैI लेकिन वक्त बीत चुका था(खैर अब फोटो साथ में ना होने का दर्द तो जीवनभर रहेगा) I

दो लड़कों को आठवीं के विदा होने वाले विद्यार्थियों को नाश्ते की प्लेटें देने की जिम्मेदारी दी गई थी, उनको तो ये पता नहीं था कि इसने 50 रूपये दिये है या नहीं, तो उन्होंने प्लेट मेरी और बढाई , अब बालमन था, भूख भी लगी थी तो उस प्लेट का नाश्ता मैने भी कर लियाI

विदाई समारोह के बाद हम सभी आठवीं वाले विद्यार्थी हमारी क्लास के रूम में बैठे थे( कोर्स पूरा होना थोड़ा बाकि था, तो विद्यार्थियों को विदाई समारोह के बाद भी 8-10 दिन तक रेग्युलर आने के निर्देश थे) I

तब आपका आगमन क्लास में होता है और बात बात में नाश्ते के बारे में चर्चा छिड़ती है, आपने मूझे पूछा कि तूने भी नाश्ता किया है क्या- तब नीचे किया हुआ मेरा ग्लानि से भरा हुआ चेहरा मौन सहमति दे ही रहा था, फिर भी मैंने संकोचवश कहाँ कि हां माड़सा, नाश्ता तो कर लिया I फिर आपके कड़वाहट भरे शब्द "चल निकाल दस रूपये नाश्ते की प्लेट के ? या अभी घर जाकर दस रूपये लेकर आ! "

मैं चेहरा नीचा किये हुए लकड़ी बैंच पर बच्चों द्वारा पेन से किये हुए घिंटे(निशान) देख रहा था I फिर आपने कहा कि नाश्ता बाकि विद्यार्थियों को के पैसों से किया है, सो कल सभी विद्यार्थियों को एक- एक रूपया लाके देना(आठवीं में 12-13 विद्यार्थी ही थे) I या फिर इन बच्चों से मांफी मांग, अगर ये बच्चे माफी दे तो मत लानाI (आपसे तो मेरे वो सहपाठी भी सो गुना ठीक थे, जो मैरा चेहरा और झुके इससे पहले ही माफी दे दी)I

अब ऐसी चीजों का एक 12-13 साल के बालक के अंतर्मन पर क्या प्रभाव पड़ता है ये मनोविज्ञान के विद्यार्थी या शिक्षक अच्छे से जानते हैं I

सर हो सकता है ये घटना आपको अब याद ना हो I आपने ऐसा क्यों किया इसका कारण भी मैं अब नहीं जानना चाहता, लेकिन इस घटना का मेरे बालमन पर जो प्रभाव पडा़ था, वो जिंदगी भर एक शिक्षक/गुरु के प्रति एक विद्यार्थी/शिष्य के गुस्से का एकमात्र उदाहरण बना रहेगा I

सर पचास रूपये ना होने के कारण अपने विद्यार्थी की इतनी बेइज्जती या मखौल उड़ाना या लज्जित करना एक शिक्षक को इतना शोभा नहीं देता, सो मेरा गुस्सा जायज हैI

अब सो बातों की एक बात, सर मैं आपको 10 रूपये नाश्ते की प्लेट वाले देना चाहता हूँ, प्लीज स्वीकर करें, लेकिन वो माफी वाली घटना मेरे मन से बाहर निकलवाओ,नहीं तो उम्र भर खटकती रहेगी I

सर अब मैं उन 50 रूपये की जगह 50 हजार रूपये भी देने को तैयार हूँ पर अब 2006 की आठवीं के विदाई समारोह के ग्रुप फोटो में मुझे शामिल करो, नहीं तो उम्र भर आपको कोसता रहूंगा I

धन्यवाद

गिरधर सिंह रांदा

ग्राम विकास अधिकारी(उन्हीं शिक्षकों की बदौलत, जिन्होंने पढने का हौंसला, जोश और ज्ञान दिया)

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