क्या आप ज्ञानवापी मस्जिद की जगह भव्य काशी विश्वनाथ मंदिर बनाने के पक्ष में हैं?

 हां, एक अक्षर का ये उत्तर प्रत्येक भारतीय को देना चाहिए। बस इसके लिए जरूरी इतना है कि उसे चंद शब्दो मे इतिहास के साथ इससे जुड़े मर्म का भी पता हो। मैं थोड़े ज्यादा वजह बता सकता हूं।


मंदिर तोड़ कर बनाए गए मस्जिद को बने रहने देना चाहिए ऐसा विचार तो बस वही कर सकते हैं जो ऐसे लोगो से उपजे हों या जुड़े हों। ऐसे लोगो का सबसे पहले उपचार करना किसी भी मंदिर को पुनर्स्थापित करने से पहले जरूरी है। क्योंकि एक तरफ कोई मंदिर बन रहा होगा तो दूसरी तरफ कहीं कोई दूसरा मंदिर तोड़ा जा रहा होगा। ये भविष्य नही बल्कि आजादी के बाद से अब तक आजाद भारत का इतिहास है।


असल में देखा जाए तो कम से कम इस देश के लिए मस्जिद मात्र नष्टता का प्रतीक रहा है। चालीस हजार से ज्यादा की संख्या तो मुट्ठी भर वाली बात तो नही हो सकती है जो सेक्युलर लोग करते हैं। इस देश में चालीस हजार से ज्यादा मस्जिद ऐसे हैं जो मंदिर तोड़ कर बनाए गए हैं। किसी भी नॉर्मल दिमाग के लिए ये नॉर्मल बात तो नही हो सकती है। जो स्थान भगवान का साक्षात स्थान माना जाता है ऐसे मंदिरों का अब तक गुलामी काल वाली अवस्था में रहना इस देश के लिए शर्म है। जो इस देश के लिए मर मिटे उनका अपमान भी है।


एक बात पर सभी को गौर फरमाना चाहिए। जिन हजारों मंदिरों को तोड़ कर मस्जिद बनाया गया उन सभी में एक खासियत है। सभी मस्जिद एक डिजाइन में ही बनाए गए हैं और उसके साथ ही मंदिर के भी पार्ट दिखते हैं जिससे किसी भी नयनसुख को दिख जाए कि ये असल में मंदिर ही था। अदालत नयनसुख नही होती है।


मस्जिदों का इस तरह से बनाए जाने के दो ठोस निचोड़ निकलते हैं। पहला तो ये कि वो हमे खुल्लम खुल्ला बताएं कि देखो तुम्हारा तोड़ कर अपना बनाया है। इस बात से शत प्रतिशत लोग इत्तेफाक रखेंगे। जो नही रखते उनको ओवैसी ब्रदर्स और वैसे कई नमूनों के बयान सुनने चाहिए जो खुल्लम खुल्ला बोलते हैं कि हमने तुम पर आठ सौ साल राज किया। सही कहता है और हम शिक्षित लोग क्या करते हैं, चलता है या छोटी सोच वाली बात समझ कर अनदेखा कर देते हैं। दूसरा मजेदार निचोड़ ये है कि जो मस्जिद बनाने वाले आए तो उन्होंने सभ्यता और कलाकृति के नाम पर बस तंबू देखे थे इसलिए वो किसी भी मैटीरियल के उपलब्ध होने के बाद भी तंबू छाप से ज्यादा कुछ बना नही सकतें थे।


ये बस सोच होती तो कोई बात नही लेकिन ये हकीकत है कि पिछले दो सौ साल में एक सामान्य आकार वाला चीन सबसे बड़े महादीप में सबसे ज्यादा क्षेत्रफल वाला देश बन गया है। दूसरी तरफ विश्व में सबसे बड़े क्षेत्रफल वाला भारत वर्तमान में पहले तीन में भी नही आता। सवाल एक मंदिर या मस्जिद का होता बात तो तब भी होनी चाहिए थी लेकिन यहां सवाल हजारों में है और ये सीधे सीधे सृष्टि और संहार से जुड़ा हुआ है।


बाबर का अपने खास किशोर लड़के बाबरी से मिलने के लिए बनाया हुआ स्थान बाबरी हो या एक अमानवीय की पहचान ज्ञानव्यापी हो। यदि ऐसे लोगो में कुछ लोगो को अपनी पहचान दिखती हैं तो इस देश को अपना सेंटीमेंट्स इनसे हजार गुना ज्यादा हाई रखने की जरूरत है, क्योंकि ये भारत की पहचान की बात है। ये हमारी पहचान और हमारे आने वाले जेनरेशन के भविष्य के लिए अनिवार्य भी है। हमने हजारों साल तक पहले आप पहले आप कर लिया, अब समय है अहम ब्रह्ष्मी का भाव दिखाने का।




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