Jai shree krishna

🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🙏🚩🚩पुस्तकें परमात्मा का स्वरूप हैंएक सिद्धान्त है कि जो शास्त्रों का, पुराणों का, वेदों का आदर करता है, उसका स्वयं का आदर होता है, इनका निरादर करने से स्वयं का ही निरादर होता है, जिसका परिणाम बहुत खराब होता है, इसलिये गीता, रामायण, सहस्रनाम, हनुमानचालीसा आदि को नीचे नहीं रखना चाहिये! नीचे रखना ही हो तो कपड़ा रखकर उस पर रखो, नहीं तो अपनी गोद में रखो, हाथों में रखो! यह बात आप सदा के लिये, उम्रभर के लिये याद कर लो! परमात्मा सब जगह परिपूर्ण हैं! पुस्तकें परमात्मा का स्वरूप हैं! जिस ज्ञान से हमें तत्त्व की प्राप्ति होती है, मुक्ति होती है, कल्याण होता है, वह ज्ञान गीता आदि में भरा हुआ है! इसलिए किसी भी पूजनीय पुस्तक, वस्तु आदि का तिरस्कार, अपमान, निरादर कभी मत करना, यह बात आपके भीतर स्वत: स्वाभाविक पैदा होनी चाहिये, स्वत: पैदा न हो तो सीख लो, याद कर लो🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🙏रसखान कौन थे और क्यों एक मुस्लिम को भगवान कृष्ण ने खुद दर्शन देकर बनाया था अपना भक्तरसखान के रवैये आप सभी को याद होंगे। हिंदी की किताब में बचपन में आपमें से कई लोगों ने इन्हें पढ़ा होगा। लेकिन क्या आपको पता है कि रसखान का असली नाम ‘सैयद इब्राहिम’ था। हिंदी साहित्य में ‘रसखान’ का नाम किसी पहचान की मुहताज नहीं है। कृष्ण भक्ति में डूबी रसखान की कविताओं में सूफियत भी है लेकिन भगवान कृष्ण की महिमा का मंडन भी है।रसखान हिंदी साहित्य का जाना माना नाम हैं।रसखान श्रीकृष्ण के भक्त थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए श्रीकृष्ण के स्वरूप का वर्णन किया है।रसखान की कहानी बहुत कम लोगों को पता है लेकिन कहा जाता है कि भगवान ने उन्हें खुद दर्शन दिए थे।रसखान श्रीकृष्ण के परम भक्तों में से एक थेधर्म और भक्ति का कोई भी सीधा संबंध नहीं है बल्कि भक्ति हमेशा ही विश्वास और आस्था से जुड़ी चीज है। फिर भी इतना अवश्य है कि एक सामान्य मनुष्य का मन हमेशा ही अपने परिवेश से प्रभावित होता है। वह अपने आसपास, समाज और परिवार में जो सभ्यता-संस्कृति देखता है उसी को अपने जीवन में भी अंगीकार करता है। ऐसे में किसी मुस्लिम के मन में हिंदू धर्म और हिंदू भगवान के प्रति इतनी गहरी आस्था का भाव अपने आप में ही विस्मयकारी है।रसखान की कविताओं में कृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर चीर हरण, कुंज लीला, रस लीला, पनघट लीला और दान लीलाओं तक का वर्णन मिलता है। इतना भी नहीं उन्होंने भगवान शिव, गंगा और हिंदू त्यौहारों पर भी कविताएं लिखी हैं। कहते हैं सैयद इब्राहिम की भक्ति से खुश होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिए थे और खुद उनका नाम ‘रस खान’ रखा था। ‘रस’ अर्थात जो रसीला या मन को मोहने वाला हो... और ‘खान’ अर्थात ‘खजाना’।रीतिकाल के प्रमुख कवियों में एक रसखान ने प्रसिद्ध गुरु गोस्वामी विट्ठल जी से दीक्षा ली थी। कृष्ण भक्ति में इनके रमने और विट्ठल जी के शिष्य बनने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। कहते हैं रसखान को बाल्यकाल से ही हिंदू धर्म के बारे में जानने की बड़ी उत्कंठा थी। ऐसा भी माना जाता है कि संपूर्ण भगवद्गीता का उन्होंने फारसी में अनुवाद किया है, हालांकि इसके बारे में कोई मान्य तथ्य उपलब्ध नहीं हैं।सैयद इब्राहिम के मन में कृष्ण भक्ति का भाव आने में उनकी इस रुचि के अलावा एक महिला के प्रति प्रेम-अनुरक्ति भी रहा। कहते हैं कि विट्ठल जी की दीक्षा लेकर वृदांवन आने से पूर्व वे दिल्ली में रहते थे और एक महिला के प्रति उनके मन में खास आसक्ति के भाव थे। किंतु वह महिला उन्हें कठोर शब्द कहा करती थी। एक बार की बात है कि वे भगवद्गीता पढ़ रहे थे जिसमें गोपियों के साथ कृष्ण की लीला का प्रसंग आया। रसखान के मन में अचानक यह प्रश्न कौंधा कि गोपियों का यह स्वार्थरहित प्रेम कितना पावन है। उन्होंने उसी वक्त कृष्ण के प्रेम में अपना मन रमाने का निश्चय कर लिया, इसके पश्चात वृंदावन आये और विट्ठल जी से दीक्षा ली।एक अन्य कथा के अनुसार किसी वैष्णव (विष्णु को मानने वाला) ने रसखान को वृंदावन जाने की सलाह दी थी लेकिन जब वे वहां गए तो मुस्लिम होने के कारण उन्हें कृष्ण मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया गया। इससे आहत सैयद इब्राहिम वृंदावन के नदी तट पर तीन दिनों तक भूखे-प्यासे बैठे रहे। इससे प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने स्वयं उन्हें दर्शन दिए और उसी समय उनका नाम ‘रसखान (जिसके हृदय में अगाध प्रेम है)’ रखा।उसके पश्चात उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान कृष्ण को समर्पित कर दिया और जीवनपर्यंत वृंदावन में ही रहे। भक्ति रस की उनकी कविताओं में सगुण और निर्गुण दोनों ही भाव हैं। ब्रज भाषा में लिखी उनकी कविताओं में कृष्ण-भक्ति के अलावा प्रेम-रस खास तौर से रहा। “सुजान रसखान” और “प्रेम वाटिका” उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं जो इन्हीं भावों पर आधारित हैं।हिंदी साहित्य में जहां उनका बहुत बड़ा योगदान माना जाता है, वहीं धर्म से परे उनकी यह कृष्ण-भक्ति विशुद्ध प्रेम, आस्था का भी उदाहरण बन गया।🙏 जय श्री राधे 🙏

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